चंडीगढ़ नगर निगम के पूर्व पार्षद शक्ति प्रकाश देवशाली ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशहित में संयम, ईंधन बचत, अनावश्यक खर्च में कटौती और सोने की खरीद टालने जैसी अपीलों पर कांग्रेस के हमले की तीव्र निंदा करते हुए इसे न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बताया बल्कि इसे राजनितिक पाखण्ड का चरम बताते हुए कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की राजनीतिक स्मृति पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए। जब देश आर्थिक, सामरिक या वैश्विक अस्थिरता के दौर से गुजरता है, तब जनता से संयम, त्याग और जिम्मेदारी की अपील करना किसी भी जिम्मेदार नेतृत्व का कर्तव्य होता है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को इतिहास नहीं भूलना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू ने भी संकट के समय जनता से त्याग और जिम्मेदारी की अपील की थी और 1950 के दशक के खाद्य संकट में उन्होंने नागरिकों से सप्ताह में एक बार भोजन छोड़ने जैसी अपील भी की थी। इसलिए आज प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय हित में संयम की बात कहना कोई असामान्य या अलोकतांत्रिक बात नहीं है। लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 के कठिन दौर में देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने और एक समय भोजन छोड़ने का आह्वान किया था। यही जिम्मेदार नेतृत्व की परंपरा है।
देवशाली ने राहुल गाँधी को उनकी दादी की याद दिलाते हुए कहा कि इंदिरा गांधी ने भी 1967 में लोगों से ‘किसी भी रूप में’ सोना न खरीदने और देश में सोने की खपत के मामले में ‘राष्ट्रीय अनुशासन’ का पालन करने की अपील की थी। इतना ही नहीं, बांग्लादेश शरणार्थियों की सहायता के लिए इंदिरा गांधी ने डाक सामग्री और संबंधित सेवाओं पर 1971 से 1973 तक 5 पैसे का सरचार्ज लगाया गया था। जिससे स्पष्ट है कि कांग्रेस सरकारें भी राष्ट्रीय और मानवीय संकटों में जनता से आर्थिक भागीदारी मांगती रही हैं।
वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने 2013 में खुलकर देशवासियों से सोना न खरीदने की अपील की थी। यह अपील उसी सरकार की आर्थिक सोच का हिस्सा थी जिसका नेतृत्व डॉ. मनमोहन सिंह कर रहे थे।
देवशाली ने कहा कि आज वही कांग्रेस, जिसके नेताओं ने अलग-अलग दौर में जनता से भोजन बचाने, आर्थिक योगदान देने, सोना न खरीदने और राष्ट्रीय संकट में त्याग की अपील की, वह प्रधानमंत्री की अपील को लेकर घड़ियाली आंसू बहा रही है। कांग्रेस को राष्ट्रहित के प्रश्नों पर तात्कालिक राजनीति छोड़नी चाहिए और दोहरे मापदंड की राजनीति बंद करनी चाहिए।






















