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Posted by Surinder Verma on Wednesday, June 17, 2020

रक्षा बंधन के अवसर पर किडनी दान करने वाले भाई-बहनों को किया सम्मानित

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मोहाली: रक्षा बंधन की पूर्व संध्या पर, बुधवार को एडिसन अस्पताल, मोहाली में उन दर्जनों भाई-बहनों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने अपना किडनी दान कर दूसरों को जीवनदान दिया। “बॉन्ड्स ऑफ लाइफ” शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में अंगदाता भाई-बहनों के असाधारण साहस और निस्वार्थ भावना की सराहना की गई। इस दौरान यह बात रेखांकित की गई कि कैसे जीवित रहते हुए अंगदान जीवन को बदल देता है और स्वास्थ्य का नया अवसर प्रदान करता है।
इस अवसर पर मुख्य रीनल ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. अर्जिंदर सिंह बैंस, नेफ्रोलॉजिस्ट एवं ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. तरुणा, यूरोलॉजिस्ट डॉ. निपुण गुप्ता और एडिसन की फैसिलिटी डायरेक्टर रुपिंदर कौर द्वारा 6 डोनर-रिसीपिएंट भाई-बहनों के जोड़ों को सम्मानित किया गया।
इस कार्यक्रम ने डोनर-रिसीपिएंट भाई-बहनों को अपनी भावनात्मक यात्रा साझा करने का एक मंच भी प्रदान किया—जिसमें क्रॉनिक किडनी डिजीज की शुरुआत और थका देने वाले डायलिसिस उपचार से लेकर सफल ट्रांसप्लांट सर्जरी और पूरी तरह स्वस्थ होने तक के अनुभव शामिल थे।
डॉ. अर्जिंदर सिंह बैंस ने कहा, “किडनी ट्रांसप्लांट सिर्फ एक सर्जिकल प्रक्रिया नहीं है; यह जिंदगी को मिला एक दूसरा मौका है। जब कोई भाई या बहन दान के लिए आगे आता है, तो यह रक्षा बंधन का सबसे शुद्ध रूप होता है – एक भाई-बहन के जीवन की रक्षा करना। आधुनिक तकनीकों और प्रगति के साथ, जीवित किडनी दान पूरी तरह से सुरक्षित है और यह प्राप्तकर्ता को एक सामान्य, स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्रदान करता है।”


भाई को किडनी देने वाली बरनाला की कुलविंदर कौर (38), ने कहा: “जब मेरे भाई को किडनी फेलियर का पता चला, तो अपने भाई का जीवन बचाने के लिए अपने शरीर का एक हिस्सा देना सबसे संतोषजनक काम है जो मैंने कभी किया है। आज हम दोनों स्वस्थ, सक्रिय हैं और पूरी तरह सामान्य जीवन जी रहे हैं।”
अपने भाई को किडनी दान करने के पल को याद करते हुए कुलदीप कौर ने कहा, “मुझसे अपने भाई को डायलिसिस पर धीरे-धीरे कमजोर होते नहीं देखा गया।”
उन्होंने कहा, “अपने ऊर्जावान भाई को हफ्ते में तीन बार डायलिसिस मशीन से बंधा देखना दिल दहला देने वाला था। वह दिन-ब-दिन अपनी उम्मीद खो रहा था। जिस पल डॉक्टर ने कहा कि मैं एक मैचिंग डोनर हूं, मैंने दोबारा नहीं सोचा। भाई को अपनी एक किडनी देना कोई अहसान नहीं था—बहन होने के नाते यह मेरा कर्तव्य था। उसे फिर से मुस्कुराते, काम करते और पूरी तरह से जीते देखना मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद है।”
पटियाला के नछत्तर सिंह (49), जिन्होंने अपनी बहन से किडनी प्राप्त की थी, ने भावुक होकर अपना आभार व्यक्त किया, “जब मेरी किडनियां खराब हो गईं, तो मेरी जिंदगी ठप हो गई थी। मुझे लगा कि मैं अपने परिवार पर बोझ बन गया हूं। मेरी बहन ने बिना एक पल की झिझक के आगे आकर मुझसे कहा, ‘हम इस दुनिया में एक साथ आए हैं, और हम इस बीमारी से भी एक साथ लड़ेंगे।’ उसने मुझे दूसरा जीवन दिया है, और आज मैं जो भी सांस ले रहा हूं, वह उसी का दिया हुआ उपहार है।”