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Posted by Surinder Verma on Wednesday, June 17, 2020

स्नान, दान और सूर्य देव की उपासना से मोक्ष प्राप्ति का पर्व है मकर सक्रांति

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मकर संक्रांति सूर्यदेव के मकर राशि में गोचर करने पर मनाई जाती है। हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष महत्व होता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश कर दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं जो कि अत्यंत शुभ माना जाता है।

अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा चंडीगढ़ के स्थानीय प्रवक्ता पं मुनीश तिवारी ने बताया कि इस वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी 2022, दिन शुक्रवार को मनायी जाएगी।  14 जनवरी को संक्रांति दोपहर 2 बजकर 29 मिनट पर वृष लग्न में प्रवेश करेगी। संक्रांति का पुण्यकाल संक्रांति से 6 घंटा पहले प्रारम्भ होकर 6 घंटा बाद तक रहता है इसलिए इस संक्रांति का पुण्यकाल प्रातः 8 बजकर 05 मिनट से प्रारम्भ होकर पुरे दिन रहेगा। संक्रांति का प्रारम्भ  रोहिणी नक्षत्र में हो रहा है जो कि बहुत ही शुभ नक्षत्र माना जाता है। मान्यता है कि इस नक्षत्र में स्नान दान और पूजन करना विशेष फलदायी होता है।

मकर संक्रांति का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताते हुए पं मुनीश तिवारी कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। शनिदेव को मकर और कुंभ राशि का स्वामी माना जाता है। और इस वर्ष शनिदेव पहले से ही मकर राशि में विद्यमान हैं इस कारण से यह दिन पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की असुरों पर विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस मौके पर लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान – धर्म करते हैं।

मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से खिचड़ी बनाने, खाने और दान करने का विशेष महत्व है। इसलिए बहुत सी जगहों पर इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में मकर संक्रांति को लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति पोंगल के तौर पर मनाई जाती है। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के नाम से मकर संक्रांति को मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन गर्म वस्त्र, तिल की मिठाईयां, खिचड़ी के साथ धन आदि दान देने से शनि त्रस्त व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति मिलती है। गरीब तथा अपाहिज और मजदूर वर्ग के सभी लोग शनि के प्रतिनिधि माने जाते हैं। इन्हें कभी सताना नहीं चाहिए। मकर संक्रांति पर जिस तरह दान का विशेष महत्व है उसी तरह स्नान का भी बहुत अधिक महत्व होता है। माना जाता है कि इस दिन स्नान करने से ना केवल शरीर बल्कि मन की भी शुद्धि हो जाती है। इतना ही नहीं इस दिन किसी नदी में स्नान करने से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मरने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान अवश्य करना चाहिए। यदि आप किसी पवित्र नदी में स्नान नहीं कर सकते हैं तो आपको घर में ही गंगा जल में पानी मिला कर तथा उसमें तिल डालकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद सूर्यदेव को लाल पुष्प अर्पित करें और सूर्यदेव के मंत्रों का तथा आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। उनका विधिवत पूजन करें और तिल और गुड़ से बने हुए लड्डुओं का भोग लगाने के बाद तांबे के लोटे का जल सूर्यदेव को अर्पित करें।

पं मुनीश तिवारी ने बताया कि मकरसंक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिस का निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है। पर वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महा स्नान की संज्ञा दी गई है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन को नई फसल और नई ऋतु के आगमन के लिए मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलाद्र्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।