Dainik Bhaskar
Jul 26, 2019, 12:03 AM IST
| स्टार रेटिंग | 3/5 |
| स्टारकास्ट | कंगना रनोट, राजकुमार राव, जिमी शेरगिल, अमायरा दस्तूर |
| निर्देशक | प्रकाश कोवेलामुदी |
| निर्माता | एकता कपूर, शोभा कपूर, शैलेश आर सिंह |
| जॉनर | साइकोलॉजिकल ब्लैक कॉमेडी |
| संगीत | तनिष्क बागची, रचित अरोरा |
| अवधि | 121 मिनट |
बॉलीवुड डेस्क. सनकी किरदारों के बीच रोमांस और रिलेशनशिप्स की परतें उधेड़ने की कोशिश करती फिल्म ‘जजमेंटल है क्या’ ने दुनिया को दो मेंटल लोगों के नजरिए से दिखाया है।
‘जजमेंटल है क्या’ की कहानी
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रोमांटिक और ब्लैक कॉमेडी के जॉनर में ताजगी लाने के लिए प्रयासरत दिखती इस फिल्म की नायिका बॉबी का बचपन मुश्किलों में गुजरा है। उसका बाप बात-बात पर उसकी मां को पीटता था। एक हादसे में बॉबी के हाथों ही दोनों की जान चली जाती है। वह अपने दादाजी के साथ रहते हुए बड़ी होती है। बॉबी शंकालू स्वभाव की बन जाती है।
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वरुण उसका बॉयफ्रेंड है, पर दोनों के बीच कभी टिपिकल रोमांस नहीं होता। इससे वरुण में झल्लाहट आ जाती है। एक दिन केशव और रीमा बॉबी के किराएदार बनकर आते हैं। केशव कहानी का नायक है और रीमा उसकी बीवी। पहली नजर में केशव और रीमा की आपसी मोहब्बत देख बॉबी के मन में भी अलग जज्बात उमड़ने लगते हैं। दर्शकों को लगने लगता है कि बॉबी केशव को लेकर ऑब्सेस्ट यानी आसक्त है।
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अचानक एक दिन सिलेंडर फटने से रीमा की मौत हो जाती है। अब बॉबी उसकी हत्या का इलजाम केशव पर मढ़ देती है, पर पुलिस को सबूत नहीं मिलते। केशव छूट जाता है। कहानी दो साल बाद लंदन पहुंच जाती है। बॉबी को उसके दादाजी वहां ममेरी बहन के पास थिएटर करने भेज देते हैं। मगर यहां भी किस्मत बॉबी का इंतजार कर रही होती है। ममेरी बहन की शादी केशव से हो रही है, जो श्रवण बनकर वहां रह रहा है। बॉबी और केशव के बीच फिर से चूहे बिल्ली का खेल शुरू हो जाता है। बॉबी जो सोच रही है, क्या वह हकीकत है या फिर उसके मन का वहम, फिल्म इसी पर आधारित है।
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बेहतर नहीं सिर्फ अच्छी बनकर रह गई
बॉबी को दिमागी बीमारी एक्यूट साइकोसिस है। इसमें इंसान असयिलत और भ्रम के बीच फर्क महसूस नहीं कर पाता। इस फिल्म की राइटर कनिका ढिल्लन और डायरेक्टर प्रकाश कोवेलामुदी को नायिका की इस ‘खामी’ से फिल्म को थ्रिलर की शक्ल देने में खासी मदद मिली है। फिल्म का पहला हाफ तो यकीनन बॉबी, वरुण की नोंकझोंक के साथ-साथ केशव व रीमा के आपसी संबंधों की बदौलत तेज रफ्तार से पूरा होता है। किरदारों की हाजिरजवाबी से घटनाक्रम को आगे ले जाने में मदद मिलती है। दिक्कतें इंटरवल के बाद से होने लगती हैं। केशव का किरदार उभरकर सामने नहीं आता और आखिरकार एक पोटेंशियल फिल्म बेटर बनने की बजाय सिर्फ गुड बनकर रह जाती है।
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कंगना की दमदार मौजूदगी
अदाकारी, सिनेमैटोग्राफी और कॉस्ट्यूम्स के लिहाज से यह फिल्म जरूर असर छोड़ती है। बॉबी के किरदार को कंगना रनोट ने अपनी अदाकारी और अदायगी से ऊंचाइयां प्रदान की हैं। दिमागी तौर परेशान युवती के लक्षणों को उन्होंने बखूबी पेश किया है। बॉबी के किरदार को उन्होंने इंटेंस बनाया है। इतना ज्यादा कि दर्शकों को उस किरदार पर दया की जगह खीझ होने लगती है। यह एक एक्टर की सफलता होती है। केशव के कैरेक्टर को राजकुमार राव ने इंटेंस और लाउड होने से बचाया है। ऐसा उन्होंने क्यों किया है, उसका जवाब तो वे या फिर राइटर-डायरेक्टर ही दे सकते हैं। फिर भी राजकुमार राव और कंगना रनोट ने एक दूसरे को कॉम्पिलमेंट किया है।
रीमा के रोल में अमायरा दस्तूर की प्रेजेंस से स्क्रीन पर फ्रेशनेस आती है। वरुण के तौर पर हुसैन दलाल ने प्रभावी कॉमेडी की है। बॉबी की ममेरी बहन की भूमिका में अमृता पुरी को करने कुछ खास नहीं था।
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राइटर कनिका ढिल्लन ने कहानी में गहरा उतरने की कोशिश की है, पर उसे निष्कर्ष तक पहुंचाने में चूक गई हैं। अलबत्ता सेकेंड हाफ में कहानी में काफी कन्फ्यूजन, उतार-चढ़ाव, रामायण का गैर जरूरी दर्शन जैसी चीजों की गुत्थमगुत्थी हो गई है। वह शायद फिल्म के गीत-संगीत और कैमरा वर्क से नजरअंदाज हो सकती है। ‘रंगून’ वाले पंकज कुमार ने यहां मुंबई, लंदन और किरदारों के मन में चल रही शंका-आशंकाओं को बखूबी कैप्चर किया है। शीतल शर्मा ने कॉस्ट्यूम के मोर्चे पर अपने काम को ठीक से अंजाम दिया है।
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