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Posted by Surinder Verma on Wednesday, June 17, 2020

सिंगापुर की शिक्षण प्रणाली से प्रभावित होकर 10वीं फेल ने खोला पॉलीटेक्निक कॉलेज, 200 छात्र पढ़ रहे

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  • Inspired by Singapore’s education system, Bangladeshi migrant worker starts North East Ideal Polytechnic Institute in HA

  • 24 साल की उम्र में बांग्लादेश से भागकर 2001 में सिंगापुर पहुंचे थे जॉय सुदीप भद्रो
  • वहां छात्रों को पढ़ते देख समझी तकनीकी शिक्षा की अहमियत
  • 2012 में जॉय ने बांग्लादेश में गृहनगर हबीगंज में शुरू किया था संस्थान

Dainik Bhaskar

Jul 13, 2019, 09:06 AM IST

हबीजंग. बांग्लादेश के हबीगंज कस्बे से भागकर 2001 में सिंगापुर पहुंचे जॉय सुदीप भद्रो खुद 10वीं पास नहीं हैं, लेकिन अब वे पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट चलाते हैं। इसे 2012 में शुरू किया गया था। यह बांग्लादेश के कस्बे हबीगंज का अकेला तकनीकी संस्थान है। तीन मंजिला बिल्डिंग में संचालित इस शिक्षण संस्थान में आज 200 से अधिक छात्र रोजगारपरक ट्रेनिंग ले रहे हैं। इसे नॉर्थईस्ट आइडियल पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट नाम दिया गया है।

सिंगापुर में कंस्ट्रक्शन साइट में नौकरी करते थे सुदीप

  1. 24 साल की उम्र में सिंगापुर पहुंचे सुदीप ने कंस्ट्रक्शन साइट पर नौकरी शुरू की। पास ही में एक पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट था, जिसके छात्रों को वह अक्सर देखते। इससे उन्हें समझ आया कि कई ग्रेजुएट तकनीकी ज्ञान के बिना कम तनख्वाह में मजदूरों की तरह काम करते हैं। यहीं से उन्होंने रोजगारपरक शिक्षण संस्थान खोलने का सपना देखा।

  2. 2012 में दो युवकों ने जॉय का मोबाइल-पर्स लूट लिया। इसके बाद उन्होंने सोचा कि ऐसी ही स्थिति सिंगापुर से 3917 किलोमीटर दूर उनके गृह नगर हबीगंज में भी होगी। वे बांग्लादेश लौट आए और जमा पूंजी से इंस्टीट्यूट की शुरुआत की।

  3. जॉय बताते हैं- सिंगापुर में छात्रों को शिक्षण संस्थान जाते देखना नई बात नहीं थी, लेकिन एक बांग्लादेशी के लिए यह नई दुनिया देखने जैसा था। जब मैं यहां 24 साल की उम्र में आया तो बहुत गरीब था। आज 42 साल का हूं। मैंने अपना जीवन युवाओं की शिक्षा के लिए ही समर्पित कर दिया है।

  4. जॉय यह भी कहते हैं कि मैंने कंस्ट्रक्शन से लेकर ऑटोमोबाइल सेक्टर में कई नौकरियां की। मैंने जाना कि किन कारणों से मैं अपना हाईस्कूल पूरा नहीं कर सका। मुझे 600 सिंगापुर डॉलर (30204 रुपए) में 11 लोगों का परिवार चलाना पड़ा। यदि खुद में सुधार का सपना नहीं देखता तो आज कई जिंदगियों को बेहतर नहीं बना पाता।
     

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