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Posted by Surinder Verma on Wednesday, June 17, 2020

दिल्ली विश्वविद्यालय में “राम : जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई”पुस्तक का लोकार्पण एवं परिचर्चा , ‘राम केवल ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व नहीं बल्कि जीवन मूल्यों की सतत प्रवाहित धारा हैं’ – प्रो. योगेश सिंह

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नई दिल्ली।
दिल्ली विश्वविद्यालय के महर्षि कणाद भवन सभागार में प्रोफेसर निरंजन कुमार द्वारा संपादित पुस्तक “राम: जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई” का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति द्वारा किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार;विशिष्ट अतिथि ऑर्गनाइजर पत्रिका के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर;कार्यक्रम के अध्यक्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.योगेश सिंह; पुस्तक के संपादक एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. निरंजन कुमार की गरिमामयी उपस्थिति रही।

मुख्य अतिथि आलोक कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि राम भारतीय जीवन-दृष्टि के केंद्र में स्थित आदर्श हैं, जो केवल आस्था के विषय नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार के मानक भी हैं। उन्होंने राम के चरित्र को त्याग, मर्यादा, न्याय और लोककल्याण की सर्वोच्च परंपरा का प्रतीक बताया और कहा कि राम राष्ट्र की सामूहिक चेतना के प्रतिनिधि हैं, जो समाज को एक सूत्र में बाँधने की क्षमता रखते हैं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि राम भारतीय परंपरा में केवल ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों की सतत प्रवाहित धारा हैं। उन्होंने तुलसीदास के संदर्भ में कहा कि जिस प्रकार अतीत में समाज को दिशा देने हेतु रामकथा का पुनर्पाठ आवश्यक था, उसी प्रकार वर्तमान समय में भी राम के आदर्शों की प्रासंगिकता बनी हुई है। राम एक व्यापक जीवन-दृष्टि हैं, जो समय के साथ निरंतर विस्तृत होती रहती है। साथ ही उन्होंने यह भी इंगित किया कि रामकथा और रामायण भारतीय समाज की आत्मा हैं। राम मंदिर केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। रामचरित मानस जैसा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं और तुलसीदास जैसा कोई दूसरा रचनाकार नहीं यह भारतीय साहित्य की अद्वितीय धरोहर है।

विशिष्ट अतिथि प्रफुल्ल केतकर ने पुस्तक की वैचारिक गहराई और व्यापक दृष्टिकोण की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में बाहरी प्रभावों और वैचारिक आक्रमणों के कारण भारतीय संस्कृति की जड़ों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे समय में यह पुस्तक सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

पुस्तक के संपादक प्रो. निरंजन कुमार ने अपने वक्तव्य में बताया कि रामकथा ने विभिन्न धर्मों और परंपराओं को प्रभावित किया है तथा राम, पंथनिरपेक्षता के सशक्त प्रतीक हैं।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह पुस्तक वैचारिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय जीवन मूल्य की दृष्टियों से भगवान राम पर केंद्रित दुर्लभ लेखों का एक महत्त्वपूर्ण संकलन है। इसमें स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बी. आर. रामचंद्र दीक्षितार, वासुदेव शरण अग्रवाल, कामिल बुल्के, मुंशी प्रेमचंद जैसे मनीषियों के लेख हैं वहीं राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक समरसता तथा जौवन मूल्यों के आलोक में मीडिया जगत, मैनेजमेंट, चिकित्सा विज्ञान, इतिहास, दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, संस्कृत एवं हिंदी आदि के वि‌द्वानों के लेख भी समाहित हैं।