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Posted by Surinder Verma on Wednesday, June 17, 2020

बिना आयुर्वेद के स्वास्थ्य का अधिकार केवल एक मिथक है: आचार्य मनीष

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स्वास्थ्य का अधिकार अभियान शुरू किया
आयुर्वेद को समान अधिकार दिलाने के लिए जनहित याचिका दायर करने की योजना
प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ, आचार्य मनीष ने आयुर्वेदक चिकित्सकों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए एलोपैथिक डॉक्टरों की निंदा की
चंडीगढ़,सुनीता शास्त्री। प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य मनीष ने आयुर्वेद के माध्यम से स्वास्थ्य का अधिकार अभियान ‘ नामक एक अनूठी पहल को हरी झंडी दी है। आचार्य मनीष 1997 से आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और आयुर्वेदिक लेबल ‘शुद्धि आयुर्वेद ‘ के संस्थापक भी हैं, जिसका कॉर्पोरेट कार्यालय चंडीगढ़ के पास जीरकपुर में है। आचार्य मनीष ने यहां प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान ‘स्वास्थ्य के अधिकार अभियान ‘ की आधिकारिक रूप से घोषणा की। इस अभियान की टैगलाइन है- आयुर्वेद को है अब घर-घर पहुंचाना ‘ । आचार्य मनीष ने कहा, ‘चरक संहिता के अनुसार, आयुर्वेद का उद्देश्य है – स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के विकारों को जड़ से समाप्त करना। आयुर्वेद का अर्थ ही है आयु को जानने का संपूर्ण विज्ञान। आयुर्वेद सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है।’ प्रेस वार्ता में आयुर्वेदिक चिकित्सक- डॉ. गीतिका चौधरी और डॉ. सुयश प्रताप सिंह भी उपस्थित रहे। आचार्य मनीष का मानना है कि आयुर्वेद हर एक भारतीय के ‘स्वास्थ्य के अधिकार ‘ के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। हमने कोविड युग को इस अभियान की शुरुआत के लिए इसलिए चुना, क्योंकि कोविड के खिलाफ प्रभावकारिता के कारण आयुर्वेद इस अभूतपूर्व महामारी के दौरानप्रमुखता से सामने आया है। यह अभियान आयुर्वेद के प्रति एक सम्मानजनक कदम है। यह अभियान 6 माह तक चलेगा, जिसके तहत हम मीडिया, विशेष आयोजनों और कार्यक्रमों के जरिये आयुर्वेद एवं संबद्ध उपचार विधियों के बारे में जागरूकता पैदा करेंगे। इसका अंतिम उद्देश्य है आयुर्वेद के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य का अधिकार दिलाना। उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) स्वास्थ्य को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की एक संपूर्ण स्थिति के रूप में परिभाषित करता है, न कि महज बीमारी यादुर्बलता की अनुपस्थिति। अत: डब्ल्यूएचओ की स्वास्थ्य परिभाषा को वास्तविकता में बदलने के लिए, ऐसी उपचार विधियों की जरूरत है, जो न केवल चिकित्सा स्थितियों का इलाज करें, बल्कि शारीरिक और मानसिक कल्याण पर भी ध्यान दें। इस अभियान के माध्यम से आचार्य मनीष और उनकी कानूनी टीम संविधान के अनुच्छेद 21 की भी ओर ध्यान खींचना चाहती है, जो प्रत्येक नागरिक को जीवन की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। उच्चतम न्यायालय ने भी माना है कि अनुच्छेद 21 में निहित अधिकार, राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों से लिए गए हैं, इसलिए अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य की सुरक्षा भी शामिल है।आचार्य मनीष ने कहा, स्वास्थ्य का अधिकार लागू नहीं हो पा रहा है, क्योंकि समग्र स्वास्थ्य प्रदान करने में आयुर्वेद की शक्ति के बारे में जागरूकता की कमी है। आयुर्वेद ही डब्ल्यूएचओ द्वारा प्रस्तुत परिभाषा को प्रमाणित कर सकता है, क्योंकि यह न केवल बीमारियों का इलाज करता है, बल्कि समग्र स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा में सुधार भी करता है, जिससे कि बीमारी पैदा ही न हो। यह कोविड महामारी के दौरान इस्तेमाल की जा रही आयुर्वेदिक दवाओं से प्रतिरक्षा में हो रही वृद्धि से अच्छी तरह साबित हुआ है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि स्वास्थ्य का अधिकार आयुर्वेद के बिना एक मिथक है। आचार्य मनीष ने आगे कहा, एलोपैथी रोगग्रस्त शरीर को ठीक करने में ही सक्षम है और संक्रमण से बचाने के लिए यह उतनी कारगर नहीं है। स्पष्ट है कि स्वास्थ्य का अधिकार एलोपैथी के जरिये प्राप्त करना संभव नहीं होगा। दूसरी तरफ, आयुर्वेद शरीर को डिटॉक्स करने का काम करता है, ताकि कोई बीमारी हो ही नहीं। इसमें योग, पंचकर्म आदि जैसे पहलू भी शामिल हैं, जो व्यापक स्वास्थ्य सुनिश्चित करते हैं।