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Posted by Surinder Verma on Wednesday, June 17, 2020

महाराजा रणजीत सिंह 500 साल के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ शासक, उनकी नीतियां आधार बनीं

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  • अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ अलबामा ने यह सर्वे किया, इसमें शासकों की कार्य शैली, सेना के नवीनीकरण और व्यापारिक नीतियों को आधार बनाया
  • महाराजा के वंशज बाेले- भारत में भले ही उन्हें महत्ता नहीं मिली, लेकिन सारी दुनिया उनके शासन काल और कुशल शासक होने का लोहा मानती है

Dainik Bhaskar

Jan 09, 2020, 09:06 AM IST

अमृतसर. पहले सिख शासक और पंजाब को एक सूत्र में पिरोकर उसे पख्तूनख्वा से कश्मीर तक विस्तारित करने वाले महाराजा रणजीत सिंह 500 साल के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ शासक साबित हुए हैं। महाराजा रणजीत सिंह के निधन के 180 साल बाद अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ अलबामा के सर्वे में इसकी पुष्टि हुई है।

उनकी कार्य शैली, रण कौशल, प्रजा नीति, सेना के नवीनीकरण, आर्थिक और व्यापारिक नीतियों को आधार मान कर टॉप-10 शासकों को सूचीबद्ध किया है। महाराजा रणजीत सिंह पहले स्थान पर रहे। इसी तरह से टॉप-5 शासन काल को किए गए सूची में महाराजा का शासन काल पहले स्थान पर आया है।
 

वंशज बाेले- महाराजा ने गठित की थी सिख खालसा सेना 

  • महाराजा रणजीत सिंह के वंशज डॉ. जसविंदर सिंह तथा एडवोकेट संदीप सिंह ने बताया,  “भारत में भले ही महाराजा को वह महत्ता नहीं मिली, लेकिन अब सारी दुनिया उनके शासन काल और कुशल शासक होने का लोहा मानती है। उक्त लोगों का कहना है कि विदेशी हमलावरों के दौर में महाराजा रणजीत सिंह ने देश की पश्चिमी छोर पर उनको रोका और उनको शिकस्त देते हुए सिख साम्राज्य की स्थापना की।”
  • “वह ऐसे शासक थे जिन्होंने अपने राज्य का विस्तार देश की सीमाओं से बढ़ा कर पेशावर, पख्तूनख्वा, कश्मीर तक किया। यही नहीं बल्कि उन्होंने उस दौर आपस में लड़ने वाले रजवाड़ों को एक सूत्र में पिरो कर एक समृद्ध और संगठित शासन खड़ा किया।”

कभी भी किसी को मृत्युदण्ड नहीं दिया, जजिया कर पर भी लगाई थी रोक

जसविंदर सिंह ने बताया कि उन्होंने कानून और व्यवस्था कायम की और कभी भी किसी को मृत्युदण्ड नहीं दिया। उनका सूबा धर्मनिरपेक्ष था। उन्होंने हिंदुओं और सिखों से वसूले जाने वाले जजिया पर भी रोक लगाई। कभी भी किसी को सिख धर्म अपनाने के लिए विवश नहीं किया। उन्होंने अमृतसर के हरिमंदिर साहिब गुरुद्वारे में संगमरमर लगवाया और सोना मढ़वाया, तभी से उसे स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा।